रायपुर/बस्तर। छत्तीसगढ़ की सियासत में एक बार फिर “अलग बस्तर राज्य” का मुद्दा गर्म हो गया है। सुकमा से बस्तरिया राज मोर्चा ने पृथक बस्तर राज्य की मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। मोर्चा के संयोजक और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम का कहना है कि यह अभी शुरुआत है और आने वाले दिनों में इस मांग को और बड़े स्तर पर उठाया जाएगा।
हालांकि, फिलहाल बस्तर को छत्तीसगढ़ से अलग करने का कोई सरकारी फैसला नहीं हुआ है। मामला अभी मांग, हस्ताक्षर अभियान और राजनीतिक बहस तक सीमित है।
आखिर क्यों उठ रही है अलग बस्तर राज्य की मांग
बस्तरिया राज मोर्चा का तर्क है कि बस्तर की अपनी अलग ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान है। मोर्चा का कहना है कि बस्तर का क्षेत्रफल देश के कई राज्यों से बड़ा है और आबादी भी कई छोटे राज्यों से अधिक है। ऐसे में बस्तर को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग जायज है।
1. विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल
मनीष कुंजाम का आरोप है कि आजादी के करीब आठ दशक बाद भी बस्तर को विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वह हिस्सेदारी नहीं मिली, जिसकी क्षेत्र को जरूरत है। उनका सवाल है कि बस्तर के पास प्राकृतिक संसाधनों की इतनी बड़ी संपदा होने के बावजूद स्थानीय लोगों को उसका पर्याप्त लाभ क्यों नहीं मिल रहा?
2. जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय अधिकार
अलग राज्य की मांग के पीछे जल, जंगल और जमीन का मुद्दा भी प्रमुख है। मांग करने वालों का आरोप है कि बस्तर के खनिज और प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल तो बड़े पैमाने पर होता रहा, लेकिन स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी और अधिकारों का सवाल अब भी कायम है।
3. नक्सलवाद और लंबे संघर्ष का इतिहास
मनीष कुंजाम बस्तर में लंबे समय तक चले नक्सलवाद, सलवा जुडूम और उसके बाद बढ़ी औद्योगिक गतिविधियों को भी अपने तर्क का हिस्सा बताते हैं। उनका आरोप है कि बस्तर लंबे समय से संघर्ष और संसाधनों की राजनीति का केंद्र रहा है।
4. रोजगार और स्थानीय युवाओं का मुद्दा
बस्तर में स्थानीय युवाओं को रोजगार और सरकारी भर्ती में प्राथमिकता देने की मांग भी लंबे समय से उठती रही है। कांग्रेस ने भी हालिया प्रस्तावों में स्थानीय रोजगार, आदिवासी अधिकार, PESA और पांचवीं अनुसूची के प्रभावी पालन जैसे मुद्दों पर जोर दिया है।
CM विष्णुदेव साय का बड़ा बयान
अलग बस्तर राज्य की मांग पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कड़ा रुख अपनाया है।
4 सितंबर को दिल्ली दौरे से लौटने के बाद रायपुर में पत्रकारों से बातचीत में CM साय ने अलग बस्तर राज्य की मांग करने वालों को “विकास विरोधी” बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर में लंबे समय तक नक्सलवाद के कारण सड़क, स्कूल और दूसरे विकास कार्य प्रभावित रहे, लेकिन अब सरकार का फोकस बस्तर को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने पर है।
CM साय ने नक्सलवाद के खिलाफ मिली सफलता का जिक्र करते हुए कहा कि अब बस्तर में विकास को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने सरकार की योजनाओं के तहत सड़क, बिजली, पानी, स्कूल और अस्पताल जैसी सुविधाओं के विस्तार की बात भी कही।यानी सरकार का साफ संदेश है—अलग राज्य नहीं, बल्कि मौजूदा छत्तीसगढ़ के भीतर बस्तर का तेज विकास।
दीपक बैज का रुख भी अलग राज्य के पक्ष में नहीं
इस पूरे मामले में दिलचस्प बात यह है कि सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस का रुख इस मुद्दे पर काफी हद तक समान दिखाई दे रहा है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने स्पष्ट किया है कि मनीष कुंजाम की अलग बस्तर राज्य की मांग उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है, लेकिन यह कांग्रेस की मांग नहीं है। बैज के मुताबिक छत्तीसगढ़ बहुत बड़ा राज्य नहीं है और बस्तर का विकास इसी राज्य के भीतर किया जा सकता है।
हालांकि बैज बस्तर के जल-जंगल-जमीन और आदिवासी अधिकारों को लेकर सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका जोर संविधान की पांचवीं अनुसूची और PESA कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने पर है।
यानी कांग्रेस का तर्क है कि अलग राज्य बनाने के बजाय बस्तर के संवैधानिक और स्थानीय अधिकार मजबूत किए जाएं।
भाजपा और कांग्रेस के बीच मुद्दे पर क्या अंतर?
भाजपा:अलग बस्तर राज्य की मांग को विकास विरोधी बताती है और बस्तर का विकास छत्तीसगढ़ के भीतर करने की बात कह रही है।
कांग्रेस:अलग राज्य के पक्ष में नहीं है, लेकिन बस्तर में आदिवासी अधिकार, पांचवीं अनुसूची, PESA, स्थानीय रोजगार और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों को मजबूत करने की मांग करती है।
बस्तरिया राज मोर्चा:अलग राज्य को बस्तर के विकास, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकार का रास्ता मानता है। इसी उद्देश्य से हस्ताक्षर अभियान शुरू किया गया है।
अब आगे क्या?
सुकमा से शुरू हुआ हस्ताक्षर अभियान आने वाले दिनों में कितना विस्तार लेता है, यह देखना अहम होगा। फिलहाल अलग बस्तर राज्य बनने की कोई आधिकारिक प्रक्रिया या घोषणा सामने नहीं आई है, लेकिन इस मांग ने बस्तर के विकास, आदिवासी अधिकार, जल-जंगल-जमीन, संसाधनों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर एक बार फिर बड़ी बहस छेड़ दी है।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि “बस्तर अलग राज्य बनेगा या नहीं?” बल्कि बड़ा सवाल यह भी है कि बस्तर के लोग अपने क्षेत्र के विकास और संसाधनों पर कितना अधिकार चाहते हैं—और सरकारें इस मांग का जवाब किस तरह देती हैं।



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